छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में तेंदूपत्ता संग्राहकों के नाम पर करोड़ों रुपए के बोनस घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ है। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) की 4500 पन्नों की चार्जशीट के अनुसार वर्ष 2021-2022 में तेंदूपत्ता बोनस को नगद में बांटने की योजना का दुरुपयोग करते हुए अफसरों और लघुवनोपज सहकारी समिति के प्रबंधकों ने 3.92 करोड़ रुपए से अधिक की हेराफेरी की।
ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया कि तत्कालीन डीएफओ अशोक कुमार पटेल ने पूरे घोटाले की साजिश रची और विभिन्न समितियों से भारी कमीशन वसूला। घोटाले की रकम का कुछ हिस्सा पत्रकारों और राजनेताओं तक भी पहुंचाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि संवेदनशील नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वाले आदिवासी संग्राहकों को इस स्कीम की जानकारी ही नहीं थी, जिससे पता चलता है कि लाभार्थियों तक पैसा कभी पहुंचा ही नहीं।
कैसे हुआ घोटाला?
साल 2021 और 2022 में तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस की राशि नकद में देने का नियम लागू हुआ। इसी का फायदा उठाते हुए वन विभाग के अधिकारियों और समिति प्रबंधकों ने आपस में साठगांठ कर संग्राहकों के नाम पर लाखों रुपए निकाल लिए। इन पैसों को फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए हड़प लिया गया।
चार्जशीट में बताया गया है कि बोनस की राशि का 50 प्रतिशत तक कमीशन के नाम पर वसूला गया, विशेषकर दुर्गम क्षेत्रों में। वहीं सुलभ क्षेत्रों की समितियों से 10 से 15 प्रतिशत तक की राशि की वसूली की गई।
चार्जशीट के बड़े खुलासे:
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तत्कालीन DFO अशोक कुमार पटेल को 91.90 लाख रुपए मिले।
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पत्रकारों को 5.9 लाख और राजनेताओं को 7.5 लाख रुपए दिए गए।
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समिति प्रबंधकों के निजी खर्च के रूप में 2 करोड़ रुपए से अधिक की राशि इस्तेमाल की गई।
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अब तक 8 समितियों में 3.92 करोड़ रुपए के गबन की पुष्टि।
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कुल गड़बड़ी लगभग 7 करोड़ रुपए की होने का अनुमान।
किस-किस पर गिरी गाज?
इस घोटाले में अब तक 14 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इनमें DFO पटेल समेत 4 वनकर्मी और 7 प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति के प्रबंधक शामिल हैं। इनमें से 12 को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि कुछ अब भी फरार हैं। इन पर IPC की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।
कहां-कहां से हुआ घोटाला?
गबन के लिए जिन क्षेत्रों में फर्जीवाड़ा किया गया, वे सभी अत्यंत संवेदनशील, आदिवासी बहुल और नक्सल प्रभावित इलाके हैं। इनमें गोलापल्ली, मरईगुड़ा, किस्टाराम, भेज्जी, चिंतलनार, पोलमपल्ली और जगरगुंडा जैसे दुर्गम क्षेत्र शामिल हैं। यहां के कई ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें तेंदूपत्ता बोनस स्कीम की जानकारी तक नहीं दी गई थी।
ईओडब्ल्यू की कार्रवाई
EOW को इस घोटाले की सूचना एक मुखबिर के माध्यम से मिली थी, जिसके बाद गोपनीय जांच शुरू की गई। शुरुआती सबूत मिलने के बाद 8 अप्रैल 2025 को केस दर्ज किया गया और 10 अप्रैल को कई ठिकानों पर छापेमारी की गई। आरोपी अफसरों और समिति प्रबंधकों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, जिसमें उन्होंने गबन की राशि और उसके वितरण की जानकारी दी।
आगे क्या?
फिलहाल मामले की जांच जारी है और फरार आरोपियों की तलाश में छापेमारी हो रही है। संभावना है कि आने वाले समय में और भी लोगों के नाम इस घोटाले में सामने आएंगे। वहीं, जिन राजनेताओं और पत्रकारों के नाम सामने आए हैं, उनकी भूमिका की भी विस्तार से जांच की जा रही है।
यह घोटाला छत्तीसगढ़ में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है, खासकर जब इसका लाभ हाशिए पर मौजूद आदिवासी समुदायों को मिलना था। अब देखना होगा कि राज्य सरकार और जांच एजेंसियां इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती से कार्रवाई करती हैं।
