छत्तीसगढ़ के सरकारी और निजी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति को लेकर हाल ही में जारी की गई शिक्षा मंत्रालय की “परख” रिपोर्ट ने राज्य के शैक्षणिक ढांचे की वास्तविक तस्वीर सामने रख दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे अब भी 2 से 10 तक का पहाड़ा नहीं जानते, वहीं कक्षा तीसरी के लगभग आधे बच्चे 99 तक की संख्याओं को बढ़ते और घटते क्रम में नहीं सजा पाते। यह रिपोर्ट प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर चिंता का संकेत दे रही है।
कमजोर बुनियाद: तीसरी कक्षा की स्थिति चिंताजनक
रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा 3 के छात्रों की भाषा और गणित में औसत प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से कम है। भाषा से जुड़े सवालों में राज्य का औसत स्कोर 59% रहा, जो कि राष्ट्रीय औसत से 5% कम है। वहीं, गणित में 57% छात्रों ने सही उत्तर दिए, जो राष्ट्रीय औसत से 3% कम है। इसका अर्थ यह है कि प्रदेश के छात्रों की भाषा पर पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर है, जबकि गणित में स्थिति थोड़ी बेहतर है।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि केवल 55% बच्चे ही 99 तक की संख्याओं को क्रम में व्यवस्थित कर सके। वहीं, 100 रुपए के लेन-देन की क्षमता भी केवल 46% छात्रों में है, जो यह दिखाता है कि व्यवहारिक गणना की समझ भी निचले स्तर पर है।
लैंग्वेज स्किल्स की कमी और कहानी समझने की कमजोरी
रिपोर्ट के अनुसार, भाषा में छात्रों की तीन प्रमुख क्षमताओं का आकलन किया गया। इसमें रोज़मर्रा के शब्दों को पहचानना, कहानी को समझना और पब्लिक मैटेरियल (जैसे- न्यूज़, रेसिपी आदि) को पढ़ने की समझ शामिल थी।
इनमें सबसे खराब प्रदर्शन “न्यूज़ या निर्देश पढ़कर समझने” की कैटेगरी में आया, जहां केवल 55% बच्चे ही यह समझ पाए कि "आज बारिश ज्यादा होगी" का क्या अर्थ है। यह स्कोर राष्ट्रीय औसत से मेल खाता है, लेकिन बुनियादी स्तर पर यह स्थिति काफी कमजोर मानी जाती है।
एससी छात्रों का प्रदर्शन सबसे कमजोर, एसटी बेहतर
सामाजिक वर्ग के अनुसार प्रदर्शन में भी बड़ा अंतर देखा गया। अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों का प्रदर्शन सभी विषयों में सबसे खराब रहा। भाषा में SC बच्चों का औसत स्कोर राष्ट्रीय औसत से 9% कम, और गणित में 7% कम रहा। वहीं, अनुसूचित जनजाति (ST) से आने वाले छात्र अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। ST छात्रों का स्कोर राष्ट्रीय औसत से केवल 2-3% ही कम है।
गांव के छात्र आगे, निजी स्कूल पिछड़े
रिपोर्ट का एक और चौंकाने वाला निष्कर्ष यह रहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र भाषा में शहरी छात्रों से बेहतर हैं। ग्रामीण छात्रों का स्कोर नेशनल औसत से 4% कम रहा, जबकि शहरी छात्रों का 5% कम। इसी प्रकार सरकारी स्कूलों के छात्र, निजी स्कूलों के बच्चों से भाषा और गणित में आगे हैं। सरकारी स्कूल के बच्चों ने भाषा में 4% कम और गणित में 3% कम स्कोर किया, जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह गिरावट क्रमशः 5% और 5% रही।
लड़कियां हर स्तर पर लड़कों से बेहतर
लड़कियों ने सभी विषयों में लड़कों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। भाषा में लड़कियों का स्कोर राष्ट्रीय औसत से 4% कम रहा, जबकि लड़कों का 5% कम। गणित में भी लड़कियां सिर्फ 2% पीछे रहीं, जबकि लड़के 4% पीछे। यही स्थिति कक्षा 6 और 9 के स्तर पर भी देखी गई।
कक्षा 6 में गिरावट और जागरूकता की कमी
कक्षा 6 में बच्चों की स्थिति और अधिक चिंता पैदा करती है। यहां भाषा में औसत प्रदर्शन 54% रहा, जो कि तीसरी कक्षा से भी नीचे है। गणित में केवल 42% छात्रों ने सही उत्तर दिए, और अपने आस-पास की दुनिया को समझने की क्षमता केवल 47% छात्रों में पाई गई।
आसपास की दुनिया को समझने में बच्चों को खासा संघर्ष करना पड़ रहा है। सिर्फ 43% छात्र ही प्राकृतिक या सामाजिक वस्तुओं की पहचान कर सके, और केवल उतने ही बच्चों ने नक्शे पर दर्शाए गए चिन्हों और दिशा-निर्देशों को समझा।
नौंवी कक्षा के नतीजे भी निराशाजनक
कक्षा 9 के छात्रों में कहानी को गहराई से समझने और उसका निष्कर्ष निकालने की क्षमता क्रमशः 53% और 55% छात्रों में ही थी। यह राष्ट्रीय औसत से 3% नीचे रहा। गणित की बुनियादी समझ जैसे 2D और 3D आकृतियों की पहचान और 10 तक के पहाड़ों की मानसिक गणना, केवल 42% और 49% बच्चों को ही आती है।
शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
“परख” रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की शिक्षा प्रणाली की नींव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब नौंवी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते आधे से अधिक बच्चे बुनियादी गणना और पढ़ने की क्षमताओं में पिछड़ जाते हैं, तो यह न केवल शिक्षा विभाग के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है।
सुधार की दिशा में संभावनाएं और चुनौतियां
रिपोर्ट भले ही निराशाजनक हो, लेकिन यह राज्य को सुधार की दिशा में प्रयास तेज करने का अवसर भी देती है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बच्चे भाषा और व्यवहारिक गणित में अपेक्षाकृत बेहतर हैं, वहां संसाधनों को और मजबूत किया जा सकता है।
सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन जहां प्राइवेट स्कूलों से अच्छा है, यह एक सकारात्मक संकेत है कि संसाधनों के उचित उपयोग और बेहतर शिक्षण विधियों से बदलाव लाया जा सकता है। लड़कियों का बेहतर प्रदर्शन यह भी दर्शाता है कि शिक्षा में लैंगिक भेदभाव को चुनौती दी जा सकती है।
