मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास की लड़ाई: भू-विस्थापितों के गुस्से के सामने झुका प्रशासन, खाली हाथ लौटी टीम
कोरबा जिले की गेवरा परियोजना से प्रभावित मलगांव के ग्रामीणों और प्रशासन के बीच तनाव चरम पर पहुंच चुका है। शुक्रवार सुबह जब प्रशासनिक टीम ग्रामीणों के घरों को तोड़ने पहुंची, तो लोगों ने कड़ा विरोध जताया और टीम को बैरंग लौटना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उचित मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं होती, वे गांव खाली नहीं करेंगे।
उबलता मलगांव: गुस्से में ग्रामीण, पीछे हटता प्रशासन
SECL की गेवरा परियोजना से विस्थापित हो रहे मलगांव के ग्रामीण लंबे समय से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने बिलासपुर स्थित सीएमडी कार्यालय में अपनी मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा था। लेकिन उनकी उम्मीदों को झटका तब लगा, जब मात्र कुछ ही दिनों बाद प्रशासन घरों को तोड़ने की तैयारी में पहुंच गया।
केसीसी कंपनी की भूमिका पर सवाल
ग्रामीणों ने इस कार्रवाई के पीछे KCC कंपनी की भूमिका को संदिग्ध बताया है। उनका मानना है कि यह लोगों में डर पैदा करने की रणनीति है, ताकि वे बिना मुआवजे के ही गांव छोड़ दें। तहसीलदार अमित केरकेट्टा और केसीसी के मुंशी विकास दुबे के साथ पहुंचे अधिकारियों को लोगों ने घरों के सामने खड़े होकर रोका और विरोध जताया।
करोड़ों का फर्जी मुआवजा घोटाला भी उजागर
इस पूरे मामले के बीच एक और बड़ा आरोप सामने आया है – एसडीएम कार्यालय के बाबू मनोज गोविल और कथित श्रमिक नेता श्यामू जायसवाल पर फर्जी निवास दिखाकर करोड़ों रुपए का मुआवजा हड़पने का आरोप लगा है। ग्रामीणों की मांग है कि इस घोटाले की जल्द जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
‘मांगें पूरी हों, तो खुद छोड़ देंगे गांव’ – ग्रामीणों का ऐलान
ग्रामीणों का कहना है कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन जब तक उनके हक नहीं मिलते, वे झुकने को भी तैयार नहीं हैं। वे साफ कहते हैं कि मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास के वादे पूरे होने पर वे खुद गांव खाली कर देंगे।
प्रशासन के कदम को पीछे हटना पड़ा
गांववालों के संगठित विरोध के आगे प्रशासनिक अमला टिक नहीं पाया और बिना कोई कार्रवाई किए लौट गया। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन ग्रामीणों की मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाएगा, या फिर टकराव और गहराएगा?
न्यय की उम्मीद में मलगांव की आंखें अब प्रशासन और सरकार की ओर टिकी हैं।

