"छत्तीसगढ़ का नवाचार: युवा किसान ने बदली बंजर ज़मीन की तक़दीर जैविक तकनीक से"


 

कभी बंजर रही ज़मीन अब लहलहाती फसलों से भर चुकी है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि स्थानीय युवा किसान राजेंद्र सिंह की मेहनत, विज्ञान और परंपरा के संतुलन का परिणाम है। दुबछोला गांव के निवासी राजेंद्र ने कोविड काल में पुणे से लौटने के बाद अपनी पुश्तैनी बंजर ज़मीन को नया जीवन देने का संकल्प लिया, और आज वे जैविक खेती के क्षेत्र में एक मिसाल बन चुके हैं।

राजेंद्र सिंह के पास दुबछोला क्षेत्र में दो खेत हैं—एक 5 एकड़ और दूसरा 10 एकड़ का। उन्होंने शुरुआत में 8 एकड़ ज़मीन पर लौकी, खीरा, करेला, भिंडी और बरबट्टी जैसी सब्जियों की खेती की। पानी की कमी और सिंचाई की समस्या को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग पेपर का उपयोग किया। ड्रिप तकनीक से जहां सिंचाई के लिए पानी की खपत 1000 लीटर से घटकर मात्र 200 लीटर प्रति एकड़ रह गई, वहीं मल्चिंग से मिट्टी की नमी और गुणवत्ता भी बनी रही।

राजेंद्र ने खेती में एकीकृत कीट प्रबंधन प्रणाली (IPM) को अपनाया है। उन्होंने कीट नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाओं की जगह नीम तेल का छिड़काव और गेंदे के पौधों का सहारा लिया। गेंदा जहां कीटों को भगाता है, वहीं बाजार में अच्छा दाम भी देता है। फसल चक्र अपनाकर वे हर मौसम में नई फसलें उगाते हैं जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है।

इसके अलावा वे हल्दी, अदरक और बांस की खेती भी कर रहे हैं। बांस अगरबत्ती उद्योग में उपयोगी है और खेतों की सीमाओं पर सुरक्षा घेरा भी बनाता है। राजेंद्र ने रासायनिक खादों की जगह गाय के गोबर, गौमूत्र और बकरी की लीद से तैयार खाद का उपयोग किया, जिससे भूमि पहले से अधिक उपजाऊ हो गई है।

तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अपने खेतों में सीसीटीवी और इंफ्रारेड कैमरे लगाए हैं, जिनकी निगरानी वे मोबाइल एप से करते हैं। 360 डिग्री निगरानी प्रणाली से वे दिन-रात फसलों पर नजर रखते हैं, जिससे फसल चोरी और जानवरों से होने वाले नुकसान को रोकने में मदद मिलती है।

राजेंद्र बायोटेक्नोलॉजी में स्नातक (यूजी) और पुणे से परास्नातक (पीजी) कर चुके हैं और अब पीएचडी भी कर रहे हैं। उनका कहना है, "खेती अब केवल हल और बैलों का काम नहीं रहा। आधुनिक तकनीकों को अपनाकर हम कम संसाधनों में अधिक उत्पादन कर सकते हैं। जैविक खेती न सिर्फ सेहतमंद है, बल्कि प्रकृति और समाज के लिए भी लाभकारी है।"

वे युवाओं को भी प्रेरित करते हैं कि वे खेती को करियर के रूप में अपनाएं और तकनीकी नवाचारों से इसे लाभदायक बनाएं। राजेंद्र की यह सोच और मेहनत स्थानीय किसानों के लिए नई प्रेरणा बन गई है।

सम्पर्क सूत्र:
दुबछोला, खड़गवां
जिला: मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर
(छत्तीसगढ़)

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