हाईकोर्ट ने पूर्व बिलासपुर DEO की याचिका खारिज की, ट्रांसफर कमेटी को सुनवाई का निर्देश


 

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर के पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) डॉ. अनिल तिवारी को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने हाल ही में अपने तबादले और सहायक संचालक पद पर नियुक्ति को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल इस मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि ट्रांसफर कमेटी उनकी आपत्ति पर सुनवाई तीन हफ्तों के भीतर पूरी करे और इस दौरान शासन उनकी खिलाफ किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई न करे।

सुनवाई न्यायाधीश की सिंगल बेंच में

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई। शिक्षा विभाग ने 10 जुलाई को जिला शिक्षा अधिकारियों के स्थानांतरण का आदेश जारी किया था। इसी आदेश के तहत डॉ. तिवारी को बिलासपुर के जिला शिक्षा अधिकारी पद से हटाकर संभागीय संयुक्त संचालक, शिक्षा कार्यालय बिलासपुर में सहायक संचालक बनाया गया। उनकी जगह कोटा विकासखंड के शिक्षा अधिकारी विजय कुमार टांडे को बिलासपुर का नया DEO नियुक्त किया गया।

याचिकाकर्ता की आपत्ति

डॉ. तिवारी ने अपने वकील अम्रितो दास के माध्यम से दलील दी कि उनके साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठता सूची में उनका नाम 237वें क्रम पर है, जबकि उनके स्थान पर नियुक्त किए गए विजय टांडे 330वें स्थान पर हैं। यानी एक जूनियर अधिकारी को जिला शिक्षा अधिकारी बना दिया गया।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि विजय टांडे के खिलाफ पहले से कई गंभीर शिकायतें दर्ज हैं, जिनमें रिश्वत लेने के आरोप तक शामिल हैं। इन शिकायतों की जांच रिपोर्ट भी सामने आ चुकी है। इसके बावजूद उन्हें प्रमुख पद पर नियुक्त करना नियमों और प्रशासनिक पारदर्शिता के विरुद्ध है।

शासन का पक्ष

राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एसपी काले ने अदालत को बताया कि यह स्थानांतरण पूरी तरह प्रशासनिक आदेश है। अधिकारियों का कार्यभार भी उनके नए पदों पर सौंपा जा चुका है। ऐसे में हाईकोर्ट से तत्कालिक राहत देने का कोई आधार नहीं बनता।

हाईकोर्ट का निर्णय

अदालत ने कहा कि डॉ. तिवारी पहले ही ट्रांसफर कमेटी के समक्ष अपना आवेदन दे चुके हैं। इसलिए यह मामला फिलहाल कमेटी के अधिकार क्षेत्र में आता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कमेटी को तीन सप्ताह के भीतर सुनवाई पूरी कर आदेश पारित करना होगा। आदेश आने के बाद याचिकाकर्ता यदि चाहे तो आगे कानूनी उपाय अपना सकते हैं।

आदेश का महत्व

इस फैसले से यह साफ हो गया है कि प्रशासनिक तबादलों में हाईकोर्ट केवल उन्हीं परिस्थितियों में हस्तक्षेप करेगा, जहां स्पष्ट रूप से कानूनी नियमों का उल्लंघन सामने आता हो। अन्यथा संबंधित अधिकारी को पहले विभागीय स्तर पर बनी ट्रांसफर कमेटी के समक्ष ही अपनी बात रखनी होगी।

शिक्षा विभाग में हलचल

इस मामले ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच हलचल मचा दी है। वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि स्थानांतरण एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब इसमें वरिष्ठता और शिकायतों से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं, तो विवाद खड़ा हो जाता है।

डॉ. तिवारी का मामला ऐसे कई अधिकारियों के लिए मिसाल बन सकता है, जो अपने तबादले को अनुचित मानते हैं। अब सबकी निगाहें ट्रांसफर कमेटी पर टिकी होंगी कि वह इस विवाद पर क्या निर्णय देती है।

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