राजस्व रिव्यू का गलत इस्तेमाल: दुर्लभ मामलों के लिए बना प्रावधान बन रहा आम चलन, दो साल में 42 केस


 

बिलासपुर — छत्तीसगढ़ की राजस्व व्यवस्था में पुनर्विलोकन (रिव्यू) प्रक्रिया का दुरुपयोग तेजी से बढ़ रहा है। भू-राजस्व संहिता की धारा 51 के तहत यह प्रावधान केवल विशेष परिस्थितियों में विधिक त्रुटियों को सुधारने के लिए किया गया था, लेकिन अब अधिकारी इसे अपने गलत आदेशों को बचाने के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

राजस्व संहिता के अनुसार, यदि किसी राजस्व अधिकारी को यह महसूस होता है कि उसके आदेश में कोई कानूनी चूक हुई है, तो वह पहले अपने वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति लेकर ही मामला रिव्यू के लिए भेज सकता है। यह प्रक्रिया एक तरह से आत्म-सुधार की व्यवस्था है, लेकिन इसके लिए नियम सख्त हैं और उपयोग दुर्लभ स्थितियों तक सीमित है।

मामले बढ़े, पारदर्शिता घटी

बिलासपुर जिले में दो साल के भीतर ही ऐसे 42 मामले दर्ज हो चुके हैं। वर्ष 2023-24 में 14 और 2024-25 में अब तक 28 प्रकरण एसडीएम स्तर से अपर कलेक्टरों के पास भेजे गए हैं। यह संख्या यह बताने के लिए पर्याप्त है कि रिव्यू को अब एक सामान्य प्रक्रिया बना दिया गया है, जो कि राजस्व संहिता की मूल भावना के विपरीत है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति न केवल न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब पैदा कर रही है, बल्कि इससे प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल उठ रहे हैं।

ऑनलाइन रिकॉर्ड का नहीं रखा जा रहा पालन

इस प्रक्रिया में एक और गंभीर लापरवाही सामने आई है — तहसीलों में पुनर्विलोकन से जुड़े मामलों का कोई ऑनलाइन रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा। जबकि शासन द्वारा पूर्व में स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके हैं कि सभी आदेशों की पावती और दस्तावेज ऑनलाइन दर्ज किए जाएं ताकि किसी भी प्रक्रिया की पारदर्शिता बनी रहे।

भू-राजस्व संहिता क्या कहती है?

संहिता में प्रावधान है कि कलेक्टर या संभागायुक्त, स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार की शिकायत पर अधीनस्थ अधिकारियों के आदेशों की वैधता की समीक्षा कर सकते हैं। वहीं, किसी राजस्व अफसर को अपने ही आदेश में त्रुटि महसूस हो, तो वह अपने उच्चाधिकारी से अनुमति लेकर मामला भेज सकता है — लेकिन यह एक अपवादात्मक स्थिति मानी जाती है, न कि सामान्य प्रथा।

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