हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: निजी स्कूलों में NCERT की किताबों को अनिवार्य करने का आदेश निरस्त, पूरक सामग्री के रूप में निजी प्रकाशकों की किताबों को दी छूट


 

रायपुर/नई दिल्ली — छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें निजी स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक केवल एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों को अनिवार्य किया गया था। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने कहा कि सीबीएसई से संबद्ध निजी स्कूल अब कक्षा 1 से 8 तक निजी प्रकाशकों की किताबों का उपयोग "पूरक अध्ययन सामग्री" के तौर पर कर सकेंगे।

इस फैसले के पीछे एक स्पष्ट संदेश यह है कि स्कूलों की स्वायत्तता और शिक्षा की विविधता को बरकरार रखा जाए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि छात्रों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और शिक्षा की गुणवत्ता बनी रहे।

क्या था मामला?

राज्य सरकार ने वर्ष 2024 की शुरुआत में एक आदेश जारी कर सभी निजी स्कूलों को पहली से आठवीं कक्षा तक केवल NCERT या SCERT (राज्य शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) की किताबों को अपनाने के निर्देश दिए थे। इस आदेश के तहत निजी प्रकाशकों की किताबों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया था।

इसके खिलाफ कई निजी स्कूलों और प्रकाशकों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि यह आदेश शिक्षा की गुणवत्ता, नवाचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव डालता है।

हाई कोर्ट का निर्णय क्या कहता है?

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि सीबीएसई (CBSE) द्वारा 12 अगस्त 2024 को जारी गाइडलाइन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस गाइडलाइन के अनुसार:

  • कक्षा 1 से 8 तक स्कूलों को NCERT या SCERT की किताबें अपनाने की सलाह दी गई है।

  • लेकिन, स्कूल अपनी आवश्यकता अनुसार पूरक सामग्री के रूप में निजी प्रकाशकों की किताबें भी प्रयोग कर सकते हैं।

  • कक्षा 9 से 12 तक केवल NCERT की किताबें अनिवार्य रूप से उपयोग की जाएंगी।

CBSE की गाइडलाइन में क्या है?

CBSE ने किताबों के चयन और उपयोग को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  • सभी स्कूलों को अपनी वेबसाइट पर कक्षा 1 से 12 तक उपयोग की जा रही किताबों की सूची अपलोड करनी होगी।

  • प्राचार्य और स्कूल प्रबंधन को लिखित में देना होगा कि वे पुस्तकों की सामग्री की समीक्षा कर चुके हैं और उसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हैं।

  • ऐसी किसी सामग्री को प्रतिबंधित किया गया है जो धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक रूप से आक्रोश पैदा कर सकती हो।

  • पूरक सामग्री या डिजिटल सामग्री का उपयोग भी अनुमति योग्य है, लेकिन उसमें सावधानी जरूरी है।

फैसले का प्रभाव

इस फैसले से राज्य के हज़ारों निजी स्कूलों को राहत मिली है, जो पहले राज्य सरकार के आदेश के बाद पाठ्य सामग्री के चयन में खुद को सीमित महसूस कर रहे थे। अब वे छात्रों की जरूरत के मुताबिक पूरक सामग्री शामिल कर सकते हैं, जिससे शिक्षण अधिक समृद्ध और व्यावहारिक हो सकेगा।

हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह छूट "पूरक अध्ययन सामग्री" तक ही सीमित है, न कि मुख्य पाठ्यक्रम के लिए। इसका अर्थ है कि स्कूल एनसीईआरटी की पुस्तकों को ही मुख्य आधार बनाएंगे, लेकिन अतिरिक्त जानकारी या अभ्यास के लिए अन्य किताबों का सहारा ले सकते हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों की राय

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संतुलित है। एक ओर यह शिक्षकों और स्कूलों को पर्याप्त शैक्षणिक स्वतंत्रता देता है, वहीं दूसरी ओर यह छात्रों को एकरूप और सटीक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम से जोड़ता है।

वरिष्ठ शिक्षा सलाहकार डॉ. मनीषा तिवारी ने कहा, "यह निर्णय शिक्षा प्रणाली में नवाचार और गुणवत्ता को बढ़ावा देगा। लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्कूल पूरक सामग्री के नाम पर महंगी और अनावश्यक किताबें छात्रों पर न थोपें।"

अभिभावकों की चिंता

हालांकि, कई अभिभावकों ने निजी स्कूलों पर किताबों की कीमतें बढ़ाने और मनमाने ढंग से किताबें थोपने की शिकायत की थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद यह चिंता फिर से उठ सकती है। इसीलिए CBSE और राज्य शिक्षा विभाग को इस दिशा में निगरानी तंत्र मजबूत करने की जरूरत है।

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